गुजरात का राजस्व विषयक इतिहास

जब से मानव ने खेती करना सीखा तभी से खेती की जमीन से संबंधित समस्याएँ उत्पन्न हुईं । कभी-कभी ये समस्याएँ सरल होतीं तो कभी-कभी अत्यंत उलझी हुईं । कभी इन्हें समाधान से, पंचों के फैसले से, जनपद जैसे लोकतांत्रिक ढंग से हल किया जाता था । समय बीतने पर शक्तिशाली लोग राजा बने और जमीनों को विजित करके उनके मालिक बने और राज्यों की स्थापना हुई । लोगों को जमीन देकर खेती के बदले में तथा रक्षण के लिए पैदावार में से हिस्सा लेने लगे । कुछ लोगों ने जमीन खरीदी तथा दूसरे लोगों को खेती करने के लिए दी । इस तरह पैदावार में से हिस्सा लेने लगे । लगान किसान चुकाता था । वर्षों तक यह पद्धति अमल में रही तथा पैदावार में से कितना हिस्सा लेना है या लगान की रकम कितनी देनी है- इस संबंध में कोई निश्चित मानदंड नहीं थे ।

जमीन में जो खेती की जाती उसे किसान मेहनत करके करते थे तथा जमीन मालिक जमीन का हिस्सा पैदावार में से लेते थे । इसके अतिरिक्त लगान भी इन किसानों को अथवा पट्टाधारकों को देना होता था ।

जब फसल तैयार हो जाती तो उसे खलिहान में लाया जाता था जहाँ सभी का भाग अलग रखा जाता था । राज्य का लगान, भू-स्वामी का भाग अर्थात् पट्टा, अन्य ग्राम सेवकों का भाग जिन्हें किसान द्वारा वार्षिक रूप में पाँच सेर या दस सेर अनाज दिया जाता था, वह भी यहाँ से दिया जाता था जिसे वितरण या भाग बँटाई कहा जाता था ।

इस प्रकार के वितरण में लगान की चोरी किए जाने की संभावना अधिक थी । साथ ही, संग्रहीत अनाज को ढोकर ले जाना भी कठिन कार्य होता था । परिणामस्वरूप अनाज के बदले रोकड़ रकम लगान के रूप में लेना तय हुआ । वार्षिक रूप में उत्पादन का आकलन किया जाता था । यदि पैदावार 100 % या सोलह आने हो तो प्रति एकड़ कितना लगान लिया जाय, यह निश्चित किया जाता था । मानक दर को आधार मानकर पैदावार के आकलन के अनुसार लगान लिया जाता था, माफ किया जाता था या स्थगित किया जाता था । राज्यों की मुख्य आय मात्र जमीन का लगान ही थी । अतः जमीन की पैमाइश, अँकाई, दानाबंदी, आकलन और वसूली पर पूरी तरह से ध्यान दिया जाता था जिससे राज्य को अधिकाधिक रूप से आय प्राप्त हो ।

राज्य अर्थात् जमीन का लगान लेने वाला तथा जमीन धारण करने वाला लगान देने वाला था परंतु जमीन धारण करने वाला जमीन को खेती करने के लिए देकर किसान से लगान भरवाता था । दूसरी तरह से, सरकार ने जो भूमि इनाम स्वरूप दी हों उनके इनाम प्राप्तकर्ताओं को लगान माफ था । इस प्रकार के सात प्रकार के इनाम थे जिन्हें आज़ादी के बाद बंद कर दिया गया ।

ये सभी प्रकार के लोग स्वयं खेती नहीं करते थे; फिर भी, अत्यंत बड़ी रकम या पैदावार भू स्वामी के हिस्से के रूप में प्राप्त करते थे, लगान वसूल करते थे, पट्टा भी लेते थे; साथ ही, वजे जैसे अन्य कर भी लेते थे । कुछ लोग इजारा या ठेका लेकर निश्चित रकम सरकार को भरना तय करके लेन-देन करने वाले के रूप में लगान वसूल करने के अधिकार प्राप्त करते थे । इन सभी रूपों में किसान का शोषण होता था तथा लगान से प्राप्त आय अनियमित रूप में होती थी । हिसाब भी पेचीदा होता था । ऐसी विकट स्थिति में लगान वसूल करने की हिसाबी पद्धति विकसित करना कठिन कार्य था । फिर भी, समय बीतने पर शासकों ने विविध पद्धतियों से लगान वसूल किया । ऐंडरसन ने 1913 में हिसाब की नियमावली बनाई । उसके बाद आज तक इसी पद्धति के अनुसार लगान वसूली के हिसाब रखने की पद्धति अमल में है ।

भारतवर्ष में शेरशाह सूरी का शासनकाल 1539 से 1546 तक का था । छह वर्ष के अल्पकालिक शासनकाल में उसने असंख्य राजकीय और प्रशासनिक सुधार किए थे जिनमें लगान विषयक सुधार शामिल हैं । उसने गज के हिसाब से मापन पद्धति द्वारा जमीन का क्षेत्रफल निश्चित किया । एक गज अर्थात् दो फुट । जर-आयद, बागआयद और कव्वरी के रूप में खेती लायक, सिंचाई वाली फल देने वाली और चारों ओर से क्यारी बनाई हुई धान की जमीन, प्रत्येक प्रकार की उसमें होने वाली पैदावार के आधार पर तीन उप-विभाग किए- अव्वल, दोयम और सोयम जिन्हें हिन्दी में उत्तम, मध्यम और कनिष्ठ के रूप में जाना जाता है । इस तरह से, जमीन की उर्वरता के आधार पर उत्पादन के स्तर पर जमीन के प्रकार करने की रीति को प्रतवारी कहा गया ।

जमीन की पैमाइश कराकर प्रत्येक गाँव की जमीन के हिसाब के लिए एक रजिस्टर बनाया गया जिसे हिन्दी में खातावही कहा जाता है । शेरशाह ने उसे सरवही अर्थात् हिसाब का मुख्य रजिस्टर या खातावही नाम दिया । देशी नामापद्धति के अनुसार खाते डालकर खाता संख्या, जमीन मालिक का नाम, जमीन का विवरण, क्षेत्रफल, जमा हुआ लगान, बाकी लगान का विवरण उसमें भरा गया । अंग्रेजों ने इस ‘सरवही’ का ‘सरवेई’ उच्चारण किया । जमा उधार के खाते बनाए गए । सरवही का खाता नंबर अर्थात् सर्वे नंबर ।

शेरशाह की इस गज आधारित पैमाइश को तेजी से कार्य में लिए जाने के उद्देश्य से अकबर के शासनकाल में राजा टोडरमल ने 33 फुट की साँकल से पैमाइश शुरू कराई । 11 x 11 गज = 121 वर्ग गज का एक गुंठा गिना जाता था । 33 x 33 फुट के गुणांक का माप एक गुंठा कहा जाता था । जमीन की पैमाइश को यथावत रखकर उपर्युक्तानुसार नौ प्रकार की जमीन की पिछले उन्नीस वर्ष की पैदावार और उसकी औसत आय निकालकर उसके तीसरे 1/3 भाग को रोकड़ रकम में रूपांतरित करके जो रकम निकले वह लगान होता था । शुरूआत में यह गिनती प्रति वर्ष की जाती थी परंतु उसमें कठिनाई पैदा होने से उसे दस वर्ष के लिए निश्चित किया जाता था । इस पद्धति को पैमाइश और जमाबंदी कहा जाता है । यह विवरण अबुल फजल ने आइने अकबरी में दिया है ।

गुजरात में सर सयाजीराव गायकवाड के शासन काल में सर टी. माधवराव दीवान थे । उन्होंने दक्षिण भारत में भूमि सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया है । उन्होंने गायकवाडी राज्य में भी भूमि सुधार विषयक कार्य किया था । उन्होंने सिरदार लगान अधिकारियों के अधिकारों को सीमित करके सिरदारी जमीनों को राज्य की जमीन में शामिल किया था ।

तत्पश्चात् 1772 ई. में रैयतवाड़ी पद्धति की शुरूआत हुई । रैयतवाड़ी अर्थात् जिसने जमीन पर खेती की हो उससे जमीन के लगान की वसूली अर्थात् जमाबंदी । इस रैयतवाड़ी जमाबंदी को लागू किया गया । इससे आगे चलकर लॉर्ड कार्नवालिस ने 1790 ई. में बंगाल प्रांत में कायमी जमाबंदी पद्धति लागू की । सर थोमस मुनरो ने खालसा और रैयतवाड़ी पद्धति लागू की जो पहले मद्रास में तथा बाद में मुंबई प्रांत में लागू की गई । इस पद्धति में खालसा अर्थात् खालिस या शुद्ध, तमाम प्रकार के बोझ से रहित सरकार में दाखिल या सरकारी मालिकी की जमीन रैयत अर्थात् प्रजा, रैयतवाड़ी अर्थात् प्रजा या किसानों को जमीन सीधे खेती करने के लिए देने की रीति ।

जमीन का लगान सर्वे और पैमाइश के बिना पूरी तरह से वसूल नहीं हो सकता । प्रिंगल ने यह कार्य किया । यथासंभव रूप से तमाम प्रदेशों में जाकर उनके सर्वेक्षणकर्ताओं ने इस देश की जमीन की पैमाइश की, खेतवार क्षेत्रफल निश्चित किया, आकलन के आधार पर रोकड़ रकम में लगान निश्चित किया । पटवारी के रिकॉर्ड में खेत का नाम, मालिक का नाम, क्षेत्रफल, आकार आदि बातों के उल्लेख के साथ प्रविष्ट कराईं जिसके आधार पर गाँव का नमूना नंबर (1) अथवा खेतवार पत्रक तैयार हुआ । राजस्व लेखा नियमावली का यह आधारस्तंभ है । प्लेन टेबल पैमाइश और कागज की शीट पर हाथ से बनाए गए उस समय के सर्वे के टिप्पण पत्रक आज भी जमीन संग्रहालय में देखने को मिलते हैं तथा इस पैमाइश में एक सेंटीमीटर की भी क्षति देखने को नहीं मिलती ।

मुगल काल के एकम अंग्रेजों के काल में थोड़े-बहुत परिवर्तित हुए । 121 वर्ग गज का गुंठा यथावत रहा परंतु विभिन्न राज्यों में 16 गुंठा का बीघा, 24 गुंठा का बीघा- इस तरह के अलग अलग माप के बीघे के स्थान पर 24 गुंठा एकड़ नई माप के रूप में प्रचलित हुआ । लगान का क्षेत्रफल अब एकड़ और गुंठा में लिखा जाने लगा । अभी भी सौराष्ट्र में 16 गुंठा का एक बीघा होता है । गायकवाड़ी राज्य के सौराष्ट्र के क्षेत्र में 24 गुंठा का एक बीघा गिना जाता है ।

भूमि लगान कानून की शुरूआत 1827 के रेग्यूलेशन एक्ट से हुई है जिसमें सर्वप्रथम भूमि-लगान भरने की जवाबदारी जमीन धारण करने वाले की निश्चित की गई है । 1857 के ब्रिटिश राज के शासन के बाद लगान का कानून बनाया गया । प्रथम 1865 में, तत्पश्चात् 1874 में कानून बना । 1876 में कलेक्टरों से सुझाव मँगाए जाने के बाद 1879 से कानून का अमलीकरण हुआ जिसमें समय-समय पर सुधार करने के बाद यह कानून आज भी अमल में है ।

भूमि लगान हेतु मूल कानून की धारा 17 में कलेक्टर द्वारा निर्देशित रिकॉर्ड-रजिस्टरों में हिसाब रखने की व्यवस्था है । 1879 से 1913 तक कलेक्टर अपनी तरह से हिसाब रखवाते थे तथा लगान की रकम जमा कराते थे । 1913 में ऐंडरसन ने रिवेन्यू एकाउन्ट मेन्युअल बनाया जिसे गाँव-नमूना, तहसील नमूना और जिला नमूना कहा जाता है जिसमें समग्र राजस्व का हिसाब आ जाता है । यह नमूना सावधानीपूर्वक ढंग से तैयार किया गया है तथा सामान्य शिक्षित व्यक्ति उसे समझकर हिसाब कर सकता है । इसमें खेती, गैर-खेती, सार्वजनिक, इनामी एवं अन्य प्रकार की जमीन का क्षेत्रफल, आकार और गाँव, तहसील, जिले की कुल लगान की रकम, गैर-खेती आय, फुटकर पैदावार, अन्य पैदावार का हिसाब समाविष्ट किया जाता है ।

भूमि-लगान कानून के अंतर्गत धारा-214(1) में नियम बनाने का अधिकार सरकार को है । गुजरात में भूमि-लगान नियम-1972 अमल में है । ऐंडरसन द्वारा बनाए गए पुराने नियम, बोम्बे लैंड रिवेन्यू रूल्स-1921 के स्थान पर ता. 14-6-1972 से नए नियम लागू किए गए हैं । इन नियमों पर 52 (बावन) प्रशासनिक आदेश हैं तथा 327 टिप्पण या टीपें दी गई हैं ।

भूमि लगान नियम पश्चातवर्ती या पूर्ववर्ती प्रभाव से लागू किए जा सकते हैं । इस संबंध में 1983 में सुधार किया गया है । वर्तमान समय में गुजरात राज्य का समग्र राजस्व प्रशासन भूमि लगान अधिनियम 1879 एवं भूमि लगान नियम 1972 पर आधारित है ।

गुजरात 1 मई, 1960 से अलग राज्य बना । 1961 का गुजरात पंचायत अधिनियम निर्मित हुआ । 1963 से गुजरात में पंचायती राज अमल में आया । इस कानून की धारा-149, 151, 152 और 157 में लगान अधिनियम के कार्य पंचायतों को तब्दील किए गए ।

गुजरात में 1993 से नया संशोधित गुजरात पंचायत अधिनियम लागू हुआ जिसकी धारा-168, 170, 171 और 175 क्रमशः पुराने कानून के अनुसार हैं जिसमें लगान विषयक कार्य पंचायतों को तब्दील किए गए हैं ।

दुमाला रजिस्टर रखने की व्यवस्था भूमि लगान अधिनियम की धारा 53 में है जिसमें तमाम दुमाला जमीन की प्रविष्टि की जाती है । पट्टेदार जमीन पर खेती करता था लेकिन उसके अधिकारों की रक्षा के लिए कोई व्यवस्था नहीं थी । भू-स्वामी जब चाहे उसे पट्टे पर भूमि देने से मना कर देता था । 1939 में पट्टेदार के हितों की रक्षा करने वाला पट्टेदार विषयक कानून पहली बार अमल में आया जिसमें 1939 से पहले छह वर्ष से जो कोई पट्टेदार जमीन पर खेती करता हो तो उसका पट्टा रद्द करने के खिलाफ उसे अधिकार प्राप्त हुआ ।

1946 में संशोधित पट्टेदार कानून पर अमलीकरण हुआ । इसमें भी 1946 से पहले यदि कोई पट्टेदार छह वर्ष से जमीन पर खेती करता हो तो उसके अधिकारों की रक्षा की गई । ये दोनों कानून मात्र पट्टेदार विषयक थे । 1947 में खेती की जमीन के छोटे-छोटे टुकड़े होने को रोकने के लिए तथा उनके एकीकरण हेतु कानून बना जिसमें मुख्य क्षेत्र की अपेक्षा 1/16 भाग से कम जमीन को टुकड़ा माना गया । यह कानून अभी भी अमल में है । 1948 में पट्टेदारी प्रशासन और खेती की जमीन विषयक कानून जिसे पट्टेदारी कानून कहा जाता है, अमल में आया । यह कानून गुजरात राज्य में लागू हुआ । 1948 का कानून यथासंशोधित रूप में 1956 में अमल में आया जिसके परिणामस्वरूप 1-4-1957 से पट्टेदार जमीन खरीदने वाला बना ।

कच्छ और विदर्भ का पट्टेदारी कानून अलग है । वर्तमान समय में गुजरात में गुजरात, सौराष्ट्र और कच्छ ये तीन राज्यक्षेत्र हैं । गुजरात बृहद मुंबई राज्य का गुजराती भाषी प्रदेश माना जाता था ।

सौराष्ट्र राज्य ने राज्य की मालिकी की तमाम जमीन की रैयतवाड़ी की । राज्य में असंख्य रजवाड़े थे । उनके पट्टेदारों के साथ संबंध बिगड़े जिससे सौराष्ट्र राज्य ने 1949 का अध्यादेश जारी किया जो कि मुंबई के पट्टेदारी कानून पर आधारित था, जिसका अमलीकरण नहीं हो सका । केन्द्र सरकार ने पी. के. थुंगन की अध्यक्षता में समिति की रचना की जिसकी रिपोर्ट के आधार पर 1951 का सौराष्ट्र लैंड रिफोर्म एक्ट बना जो गिरासदारों के लिए था तथा 1951 का बारखली एबोलीशन एक्ट बना जो बारखलीदारों के लिए था । ये दोनों कानून खेती की जमीन के लिए थे । अतः गैर-कृषि जमीन के लिए सौराष्ट्र ऐस्टेट एक्वीजीशन एक्ट 1952 में लाया गया जिसमें गैर-कृषि विषयक तमाम सामान, कार्यालयों, सामाजिक उपयोग की वस्तुएँ, मकान आदि अर्जित हुए । इसके अतिरिक्त, सौराष्ट्र में पट्टेदारी कानून जैसे कि पट्टेदार को जमीन नहीं देने की व्यवस्था हेतु सौराष्ट्र खेत जमीन पट्टा प्रतिबंध अधिनियम 1953 से अमल में है ।

1949 के अधिनियम में धारा-54 जो गैर-कृषक को खेती की जमीन तब्दीली विषयक तथा दूसरे एस्टेट अर्जन विषयक थोड़ी सी धाराओं के सिवाय समग्र अधिनियम रद्द हुआ है ।

1960 में गुजरात कृषि भूमि सीमा नियमन कानून अमल में आया जिसमें कृषि भूमि महत्तम सीमा निर्धारित की गई । गुजरात राज्य में विविध विस्तारों की जमीन के प्रकार के अनुसार इसे निश्चित किया गया था जिसके लिए कानून में क्षेत्रफल की विस्तारवार अनुसूची तैयार की गई है । इस कानून में संशोधन करके 1976 में महत्तम क्षेत्र में कमी की गई है । साथ ही, कुछ जमीन को जो मुक्ति दी गई थी उसे रद्द किया गया; जैसे कि वीड की जमीन जिसे 1976 में कृषिभूमि के अंतर्गत रखा गया था । इस बीच गुजरात और सौराष्ट्र में असंख्य इनामी एवं विविध रूप में विभाजित भूमि-कानून अमल में आए तथा तमाम प्रकार के इनामों को रद्द किया गया । वटवा वजीफ़ादारी, ठासरानामले की सत्ता प्रकार, आँकडादारी सत्ता प्रकार, मेवासी सत्ता प्रकार, चाकरियात जमीन सत्ता प्रकार विविध कानून बना कर रद्द हुए ।

1-4-57 को कुछ पट्टेदार जमीन खरीदने वाले नहीं बन सके जिसमें धार्मिक ट्रस्टों के पट्टेदार भी शामिल थे । 1969 में सरकार ने देवस्थान इनाम निषेध कानून पर अमलीकरण किया जिसमें धार्मिक ट्रस्टों के पट्टेदारों को जमीन का मालिक बनाया गया ।

1976 में शहरी जमीन महत्तम सीमा कानून गुजरात में लागू हुआ जिसमें प्रत्येक बालिग व्यक्ति की 1000 वर्ग मीटर सिवाय की जमीन को बेशी या अधिशेष माना गया । यह कानून वर्ष 1999 से रद्द किया गया ।

ता. 1-8-1972 से गुजरात में छोटे एवं सीमांत किसानों को लगान भरने से मुक्ति दी गई । वर्ष 1960 में खेती की जमीन की महत्तम सीमा के 16 वे भाग से कम जमीन धारण करने वाले को छोटा किसान माना जाता था । ता. 1-8-1997 से तमाम किसानों को लगान भरने से मुक्ति दी गई है । किसानों को मात्र शिक्षण उपकर एवं लोकल फंड सेस भरना होता है । इस तरह एक समय राज्य की मुख्य आय का स्रोत मानी जाने वाली लगान की रकम अब माफ हुई है । इसके पीछे कारण यह है कि वर्ष 1927 में अंतिम बार सर्वे और सेटलमेंट करके लगान निश्चित किया गया था । यह सेटलमेंट 30 वर्ष के लिए लागू होता था । दूसरा सेटलमेंट 1957 से होना था जो नहीं हुआ क्योंकि जमीन संशोधन कानून के अमलीकरण में समग्र तंत्र कार्यरत था । 1987 में भी यह कार्य नहीं हुआ । परिणामस्वरूप लगान की रकम 1927 की स्थिति में अत्यंत नगण्य रकम के रूप में हो गई तथा लगान की रकम की अपेक्षा उसके एकत्रीकरण पर अपेक्षाकृत अधिक खर्च होने के कारण लगान माफ किया गया । लगान उस समय राज्य की आय का मुख्य स्रोत था जिसे माफ करने के बाद उसके स्थान पर अन्य कर सरकार ने लेने शुरू किए जिससे राज्य की आय में वृद्धि हुई है तथा किसान पर बोझ कम हुआ है । परिणामस्वरूप गुजरात में किसान समृद्ध हुआ है ।

इस तरह गुजरात में जमीन लगान का कानून समय-समय पर विभिन्न स्थितियों के आधार पर अमल में आया । उसमें परिवर्तन-परिवर्द्धन हुए । साथ ही, जमीन, जमीन व्यवस्था तथा लगान विषयक एवं सर्वे अधिकारियों के कार्य भी परिवर्तित होते रहे । लोगों की खेती की संस्कृति तथा खेतीवाड़ी के साथ जमीन की मालिकी, जमीन एवं भूमि-कानून का सीधा असर होने के कारण आज भी राजस्व तंत्र का लोगों के साथ संबंध ज्यों का त्यों रहा है ।

संदर्भ ग्रंथ :

  • प्राचीन भारत का इतिहास
  • तारीखे शेरशाही
  • तज़ुके बाबरी
  • आइने अकबरी
  • मीराते अहमदी
  • मीराते सिकंदरी
  • भूमि राजस्व अधिनियम, 1879
  • भूमि लेखा नियमावली, प्रो. (जे. एच. एंडरसन)
  • दक्षिण भारत का इतिहास
  • मुम्बई राज्य का गज़ेटियर
  • सौराष्ट्र भूमि सुधार अधिनियम
  • सौराष्ट्र बारखली निषेध अधिनियम
  • सौराष्ट्र एस्टेट एक्वी. अधिनियम

सम्पादित : एम. ए. सैयद, उप कलेक्टर,
ग्राम विकास आयुक्त का कार्यालय,
ब्लॉक सं. 16,
डॉ. जिवराज महेता भवन, गांधीनगर,
गुजरात सरकार.

 

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पिछला परिवर्तन : अक्तूबर 02 2019